Wednesday, November 18, 2009

aao simte pyar ko unmukt kare

आओ simte प्यार को उन्मुक्त करे प्यार जो हम सब से करते है पर उन्हें दर्शा नहीं पाते और जो दर्शा नहीं पाते वो दुसरे दिख नहीं पाते जो दीख नहीं पाते वो समझ नहीं पाते और फिर दुरिया बदती ही चली जाती है क्युकी बुरे तो हम है ही नहीं और तडपते है हमने उनका बुरा नहीं किया और वो हमसे नहीं बोलता भाई ही भाई का दुश्मन बन जाता है किस कमी से जरा से गिले शिकवे से ही न नहीं तो दोनों भाई अपने आप में मिलना चाहते है पर ये मिलने की बदत करे कोण कोण झुकना चाहेगा जुख कर बुला ले तो दूरियां ही ख़तम हो जाती है अरे जब हम सामने वाले को प्यार करते है तो क्यों साड़ी उम्र ये सोचे की वो बुलाये हम क्यों नहीं बुलाने भर की देर ही तो होती है उसके बाद सब गिले शिकवे ख़तम हो जाते है कितना आसान हो जाता है जीना सर क्यों न हम अपने से ही शुरुआत करे की हर गिले शिकवे को ख़तम करेंगे तो  पाएंगे की समाज जयेदा खुश होगा ये दर नहीं होगा की वो मेरा बुरा करेगा
प्यार बढेगा प्यार अगर समाज में बढता है तो

Sunday, November 1, 2009

आओ   मिल कर समाज को उस नज़र से देखे  जिस नज़र से हम अपने आप को देखते है अपने समाज को उतना ही प्यार करे जितना हम अपने आपको प्यार करते है अपने समाज को उतना ही पवित्र बनाये जितना हम अपने आपको पवित्र मानते है उतना ही उससे निखारे जितना हम आपने आपको निखारते है तभी हम पाएंगे की समाज में अपनी छवि को  मुकुराते हुए तभी हमारा समाज खिल्खलाता हुआ नज़र आएगा जहाँ सिर्फ प्यार ही प्यार ही होगा